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आप जैसे हो वैसे

एक ख्रिस्ती होना यानी आप विश्वास में कितने प्रबल हो, आपकी कोई आशंका और / या प्रश्न हो जिनका जवाब नहीं दिया गया हैं इसके बारे में नहीं हैं। वह आप कितने अच्छे थे या कितने बुरे थे, आपने गतकाल में क्या किया, या आप अंदर कितना अच्छा महसूस करते हो इसके बारे में भी नहीं हैं। आप जैसे भी हो, वैसे ही येशू के पास आ जाओ। वह एक सरल निर्णय और उस निर्णय पर डटें रहना हैं, चाहें कुछ भी हो जाए।

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"इसलिये जितने दिन तक प्रभु यीशु हमारे साथ आता जाता रहा, अर्थात यूहन्ना के बपतिस्मा से लेकर उसके हमारे पास से उठाए जाने तक, जो लोग बराबर हमारे साथ रहे।" (प्रेरितों के काम 2, 21)

"इसी से हम जानेंगे, कि हम सत्य के हैं; और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उसके विषय में हम उसके साम्हने अपने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे। क्योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है; और सब कुछ जानता है।" (1 यूहनना 3, 20)

"यदि हम अविश्वासी भी हों तौभी वह विश्वास योग्य बना रहता है, क्योंकि वह आप अपना इन्कार नहीं कर सकता॥" (2 तीमुथियुस. 2, 13)

येशू ने कहा; "हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।" (मत्ती 11, 28).

येशू ने यह भी कहा; "सो तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धमिर्यों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं॥" (मत्ती 9, 13)

और; "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है॥" (लूका 19, 10)


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